संघर्ष ने शिक्षिका से बना दिया नेता

विवाह के महज 8 साल बाद पति खोया, बच्चों की जिम्मेदारी स्वयं संभाली…

जिला बालाघाट स्थित तहसील कटंगी ग्राम बनेरा में जन्मी और कटंगी को अपनी सेवाभूमि के साथ साथ कर्मभूमि बनाया।

विवाह के महज 8 वर्ष बाद पति को खो देने के बाद फिर वो हार न मानते हुए निकल पड़ी अकेले ही संघर्ष पूर्ण जीवन की और जहाँ एक ओर पुरूष प्रधान समाज के बीच हजारों उपहास के बावजूद ईश्वर पर विश्वास और खुद के दृढ़निश्चय के दम पर संघर्ष करती रही और आज सामाजिक तथा राजनीति क्षेत्र में लगातार मुकाम में मुकाम हासिल कर रही है। संघर्ष की यह कहानी समाजसेवी और जिला पंचायत सदस्य श्रीमती केसर बिसेन की है।

शिक्षा जगत के क्षेत्र में उन्होनें बीएससी तक पढ़ाई की है।इसके अलावा टायपिंग की भी शिक्षा ग्रहण की है। एक साधारण परिवार में उनका विवाह हुआ था। विवाह के चंद साल बाद ही अस्वस्थ्ता के चलते पति का स्वर्गवास हो गया।3 बच्चों का परिवार को पालना पोषण करना मुश्किल हो रहा था।

लेकिन कहते हैं ना सच्चे दिल से कुछ करने का सोचो तो हर कार्य संभवत पूर्ण हो जाते हैं। इसी कड़ी पर अंतराल में वह सन्न 1986 में केजी 1 से पहली तक की शैक्षणिक संस्था शक्ति विद्याल मंदिर शुरू कर चुकी थी। जो आज 12वीं और साथ ही साथ महाविद्यालयीन शिक्षा प्रदान कर रहा है।

मगर, पुरूष प्रधान समाज में उनका उपहास उड़ाया जाता था। इसी उपहास ने उनका मनोबल बढ़ाया और महिला जगत को बेहतर साबित करने की प्रेरणा मिलती गई। एक शिक्षक के रुप में उनका संघर्ष मिशाल बनता गया और शिक्षा जगत से जुड़ी होने के कारण अभिभावकों से उनके रिश्ते भी। इन रिश्तों और संघर्ष ने उन्हें राजनीति में कदम रखने के लिए प्रेरित किया।

सन्न 2005 में प्रथम बार कांग्रेस पार्टी से केसर बिसेन को टिकट प्रदान करने की मांग उठी लेकिन टिकट नहीं मिल सकी। सन्न 2010 में पहली बार उन्होनें जिला पंचायत सदस्य का चुनाव लड़ा। इस चुनाव संग्राम में उनके सामने कई कठिन चुनौतियां थी जैसे राजनैतिक समझ और विपक्ष में खड़ी वह प्रतिद्वंदी प्रतियाशी महिलाएं जिन्हें मात देकर जिला पंचायत सदस्य बनना था। आखिरकार जनता ने केसर बिसेन के संघर्ष और कामयाबी को देखते हुए अपार जनसमर्थन देकर विजय बनाएं और इस तरह वह पहली बार जिला पंचायत सदस्य के रुप में निर्वाचित हुई।

जीत के बाद उन्होनें लगातार जनता के बीच सेवाकार्य किए और फिर द्वितीय बाद भी वह जिला पंचायत सदस्य निर्वाचित हुई। अपने राजनैतिक जीवन में हर दीन-दुखी और गरीब की मदद करना और हर जरूरतमंद को सरकार की योजनाओं का लाभ पहुंचाना वह उनका अपना पहला दायित्व समझती है।

वह कहती है कि महिलाओं को पुरूषों पर निर्भर होने की सोच बदलनी होगी। महिलाएं अपनी शक्ति को स्वयं पहचाने। एक महिलाओं के रुप में पारिवारिक कत्तव्यों के साथ में समाज और शिक्षा में दिया जाने वाला उनका योगदान सशक्त नारी के रुप में बड़ी मिशाल है।

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